अध्यात्म की शीतल फुव्वारों से तृष्णा की अग्नि होगी शांत : साध्वी नीतिविद्या

होशियारपुर, (भूपेश)। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान होशियारपुर में आशुतोष जी महाराज की शिष्य साध्वी नीतीविधा भारती जी ने सत्संग करते हुए अपने विचारों में कहा कि यदि किसी व्यक्ति का घर धूं-धूं कर जल रहा हो तो क्या ऐसे में वह अपने एक-एक साजो समान को संभालेगा, भस्मित वस्तुओंं के स्थान पर नवीन को स्थापित करेगा या फिर सबसे पहले अग्निशमन के लिए प्रयत्नशील होगा। इसी प्रकार आज समस्त विश्व प्रचंड अग्नि किन्ही भौतिक कारणों से नहीं भभकी। यह मानव के भ्रष्ट अंतर्मन की आग है। अंतहीन तृष्णा,स्वार्थ आदि इसका ईधन है। आज इसकी चपेट में शसकीय ,सामजिक आर्थिक से लेकर हर क्षेन्न आ चुका है। इन धधकते क्षेन्नों में आप क्या व्यवस्था कायम करेंगे। चाहे कितनी ही उत्कृष्ट नीतियों का गठन करके देख लो । सब निष्फ ल सिद्व होगी। अंत में इस अग्नि को बुझाना ही होगा। यह कार्य मात्र अध्यात्म के द्वारा ही संभव है। उन्होंनें कहा कि अध्यात्म की शीतल फुहारें ही इस अग्नि को बुझा सकती है। इस जलते विश्व को देख में देकर एक सतगुरू तो अध्यात्म की फुहारे बिखेरता ही है। पर इसके लिए देश के राजा का कुछ कर्तव्य बनता है। चाणक्य जो भारत के ब्रह्यनिष्ठ राजनैतिक गुरू हुए हैं। उनका कथन है प्रजा सुखे सुखं राज्ञ:प्रजानां च हिते हितम। नात्मप्रिय ङ्क्षहत राज्ञ:प्रजानां तु प्रिय हितम। अर्थात राजा कैसा हो। जो प्रजा के सुख मे सुखी और प्रजा के हित में अपना हित समझे। अपने आपको प्रिय लगने वाले कार्य को न करके प्रजा को प्रिय लगने वाले कार्य करे। उदाहरण ही अवधपित मर्यादा पुरूषोतम प्रभू श्री राम की। जिन्होनें प्रजा को देखते हुए पतिव्रता, पविन्न नारी मां सीता को निर्वासित कर दिया था। आज भी ऐसे ही राजा की देश को जरूरत है। अंत में साध्वी राजदीपा भारती जी ने मधुर भजनों के गायन से भक्तों को भावभिवोर कर दिया।

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