नई परम्पराएं स्थापित करता सेना प्रमुख रावत का कथन

भारतीय सेना के प्रमुख जनरल विपिन रावत के गत दिनों पंजाब में बाहरी ताकतों द्वारा आतंकवाद को पुनर्जीवित करने की अगाहकुन्न तरीके से प्रकट की गई चिंता भारत की संवैधानिक एवं राजनीतिक ढांचे के अनुसार किया गया व्यवहार नहीं कहा जा सकता। जैसे आतंकवाद को लेकर जनरल द्वारा खुले तौर पर प्रकट की गई चिंता एक गंभीर विषय है उसी तरह ही देश के संवैधानिक ढांचे के प्रति किसी फौजी अफसर द्वारा जाने-अनजाने खड़ी की जा रही यह चुनौती भी अति गंभीर है। देश के संवैधानिक ढांचे के अनुसार तय फौजी अनुशासन की दृष्टि से भी यह एक नई परम्परा सी खड़ी होती दिखाई दे रही है। अकसर किसी दूसरे देश के संदर्भ में खुले तौर पर इस किस्म की बयानबाजी हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में अवश्य होती रहती है।
जनरल विपिन रावत ने दिल्ली में पिछले दिनों एक सैमिनार में बोलते हुए कहाकि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई प्रायोजित आतंकवाद को पंजाब में पुनर्जीवित किया जा रहा है और यदि इसके विरुद्ध तुरंत कदम न उठाए गए तो फिर बहुत देर हो जाएगी। अपने इस अगाहकुन्न दावे के आधार के रूप में उन्होंने लंदन में 2020 सिक्ख रेफरेंडम हेतु सिक्ख फॉर जस्टिस संस्था द्वारा की गई रैली और भारतीय पंजाब तथा यूपी इत्यादि में खालिस्तानी गुटों के कुछ लोगों के पकड़े जाने की मीडिया में आ रही खबरों का हवाला दिया है। नि:संदेह किसी भी देश के सेना प्रमुख का अपने देश की सरहदों को लेकर चौकस रहना उसकी फर्ज अदायगी का एक पड़ा पहलू हो सकता है लेकिन जब उसको देश की आंतरिक सुरक्षा की भी उतनी ही चिंता हो तो उन्हें और भी जागरूक जनरल कहा जाएगा। लेकिन अपनी इस जागरूकता को जिस प्रकार से और जिस स्थान पर खुलतौर पर जनरल रावत ने प्रकट किया है वह उनकी फर्ज अदायगी की अनुशासनिक हदों से बहुत बाहर दिखाई दिया है। उनका यह बयान इस प्रकार का प्रभाव दे रहा है कि जैसे जनरल को उनके द्वारा दिए गए किसी अलर्ट पर देश के गृह मंत्रालय द्वारा अमल न होता दिखाई दे रहा हो और वह अपनी इस चिंता को प्रधानमंत्री, केन्द्रीय गृहमंत्री या राष्ट्रपति के साथ अपनी ड्यूटी के एक हिस्से के रूप में सांझा करने की बजाय देश की जनता के साथ खुले मंच पर सांझा करना ही आखिरी रास्ता समझ रहे हों। उनका यह कथन पंजाब की स्थिति के प्रति केन्द्रीय गृह मंत्रालय, पंजाब सरकार और प्रदेश की पुलिस के सामथ्र्य पर भी संदेह करता दिखता है। देश की सरहदी और आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेवारी फौज से पहले सीमा सुरक्षाबल, सतर्कता ब्यूरो और रॉ इत्यादि खुफिया एजेंसियों की रहती है और इनसे मिलने वाली पुख्ता सूचनाओं के आधार पर ही देश की नीति और संविधान के अनुसार प्रकटीकरण का अधिकार सिर्फ और सिर्फ केन्द्र सरकार के पास ही है।
पिछले कुछ दशकों से पंजाब की स्थिति को लेकर की जा रही समीक्षाओं में यह सामने आया है कि यहां आतंकवाद का हौव्वा खड़ा करके सरहदी सूबे के हिन्दू भाईचारे को भयाक्रांत कर राजनीतिक दल अपने हित पूरे करते आ रहे हैं। इससे पंजाब की स्वभाविक या परमात्मिक भाईचारिक सांझ को भी खतरा पैदा करने की कोशिशें होती महसूस हुई हैं। पंजाब के मौजूदा सियासी माहौल में पुन: होने लगी ऐसी कोशिशों को इस बार पंजाबियों ने शुरुआत में ही भांप कर इन्हें विफल कर दिया है। आतंकवाद आज पूरी दुनिया में है और इसे नुकेल डालने की कोशिशें भी सर्वत्र हो रही हैं। भारत में भी ये कोशिशें जारी हैं और ये होनी भी चाहिएं लेकिन इनकी आड़ में राजनीतिक मुफाद पूरे किए जाने या देश के भीतर संविधान को नजरअंदाज कर नई परम्पराओं को शुरू करना किसी भी नजरिए से सही नहीं ठहराया जा सकता। पंजाब में पूर्वकाल में हुई ऐसी सियासी साजिशों का खामियाजा सिर्फ और सिर्फ आम पंजाबी नागरिक ने ही भोगा है। राजनीतिक लोगों ने तो सिर्फ सत्ता सुख भोगे हैं और इनकी साजिशों में शामिल लोग आतंकवाद के माहौल में भी अरबपति बने हैं। एक बड़ा सवाल अब यह भी है कि आखिर कब तक, कब तक पंजाबी लोग इसी भय में जियेंगे? जनरल रावत के बयान को लेकर केन्द्रीय गृहमंत्री एवं प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे सेना प्रमुख को संवैधानिक हदों में रहने के उनके कत्र्तव्य से अवश्य अवगत करवाएं ताकि देश के भीतर संवैधानिक सर्वोच्चता बनी रहे। इसके अतिरिक्त दोनों को पंजाब की वास्तविक स्थिति भी तथ्यों समेत देश को बतानी चाहिए। एक अन्य बात जो अखर रही है वह यह है कि पंजाब के बारे में जो जानकारी जनरल रावत के पास है वह सूबे के ‘महाराजा’ मुख्यमंत्री को क्यों नहीं पता? रावत के बयान के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह का मौन भी रहस्यमयी दिख रहा है।

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