ब्रह्म ज्ञान अविनाशी व सत्य आत्मा प्रकट होती है : साध्वी आभा

जालन्धर, (मैट्रो ब्यूरो)। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा अमृतसर रोड स्थित बिधिपुर आश्रम में सत्संग कार्यक्रम करवाया गया ,इसमें सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी आभा भारती जी ने अपने प्रवचनों में बताया के महापुरष जब धरती पर आते है ,तो उनका एकमात्र ध्येय होता है । जन-जन को परम सत्य का साक्षात्कार कराना । वे जीवनपर्यन्त इस कार्य के लिए तत्पर रहते हैं । ब्रह्मज्ञान व ब्रह्मविद्या के माध्यम से वे प्रत्येक व्यकित के भीतर स्थित अविनाशी सत्य आत्मा को प्रकट करते है । यही वे संजीवनी औषधि है । जिससे वे जन समाज में व्याप्त पाप-ताप नष्ट करते हैं । किंतु समस्या तब उपजती है , जब उनके शरीर त्यागने के बाद उन्ही के नाम व फ लसफे ा को आधार बनाकर नए पंथ बना लिए जाते है । महापुरषों के द्वारा प्रदत ब्रह्मज्ञान रूपी मूल उपदेश या सारतत्त्व को छोड दिया जाता है । उनके नाम पर मात्र उपदेशों या शिक्षाओं का प्रचार किया जाने लगता है । इसका परिणाम यह होता है ,कि ब्रह्मज्ञान विहीन आस्तिक लोगों का आचरण बह्म आडंम्बरों में आकंठ डूबता चलता है । स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरो को निकृष्ट सिद्ध करने की परंम्पराएँ शुरू हो जाती है । यह मेरा और तेरा का भेद भाव उत्पन होने लगता है ।
यही संम्प्रदायिकता है । इसके अंर्तगत अनुयायी लोंग धर्म के रस का स्वाद उन्होने नही चखा होता च या प्रभु भकित करते हुए प्रतीत अवश्य होते है । किंतु वास्तविक धर्म के रस का स्वाद चखा होता है ,इसलिए उनके क्रिया कलाप भी अनेकों बार व्यर्थ के आपसी भ्रम और अंधविश्वास को प्रेरित करने वाले ही होते है । इस प्रकार उपजी साम्प्रदायिकता में अंत: व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की भावना ही मुख्य रह जाती है । विवेक का स्थान अहं के कारण गौण हो जाता है । और जो मानवीय स्वभाव को जानते है ,उन्हे यह भी अवश्य पता होगा कि जब अहं तुष्टि की भावना और व्यक्गित आर्कषण की समस्या बढती है । तो मूल मुद्दे से वह ध्यान को हटाती है । यही साम्प्रदायिकता के प्रभाव से उत्पन्न भ्रमजाल है ।

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