नारी के प्रति विकृत मानव सोच में करें बदलाव : साध्वी सौम्या

जालन्धर, (मैट्रो सेवा)। सभ्यता और संस्कृति-वर्तमान परिवेश में कुछ घुटन का सा वातावरण है। उसमें सभ्यता की वायु तो बह रही है’, परन्तु संस्कृति की ताजगी नही है । प्रमाण? वह तो प्रत्यक्ष है। जिस युग में नारी स्वतत्रंता से सांस नही ले सकती ,प्रत्यक्षत: उसकी संस्कृतिक हवा प्रदूषित हो चुकी है । आज तो सम्पन्न से सम्पन्न व सभ्यत से सभ्यत राष्ट्र तक अपने नारी वर्ग को यथेचित सम्मान देने को तत्पर नही है। सामाजिक मस्तिष्क पर अद्र्धनारीश्व रूप स्थापित था। शिव और शक्ति की बराबर आराधना व अर्चना होती थी। इसकी ज्वलंत उहारण थी ब्रह्मवादिनी वैदिक ऋषिकाँए। उसी गौरव और मान सम्मान को फिर से नारी प्राप्त कर सके और आज के सामाज में लिंग सामानता हासिल हो सके। नारी के प्रति विकृत मानव सोच में बदलाव ही समाज में लिंग समानता की कुंजी है। इस सिद्धांत को मद्देनजर रखते हुए दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न परिकल्पों में सन्तुलन के अन्तर्गत मौके पर मौजूदा जनसमूह को महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे अपराधों के विभिन्न आयामों पर साध्वी सौम्या भारती जी ने जागरूक किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य की निर्मानी नारी ही है। यदि मनुष्य जाति उन्नति चाहती है तो पहले नारी को शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण और सुबिकसित बनाना होगा। तभी मनुष्यों में सबलता, सक्षमता, सद्बुद्धि, सदगुण और महानता के संस्कारों का उदय हो सकता है।

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