जिज्ञासा मनुष्य के स्वभाव का सहज अंग : साध्वी समिधा

जालन्धर, (मैट्रो सेवा)। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा अमृतसर रोड पर स्थित बिधिपुर आश्रम में सतसंग कार्यक्रम करवाया गया जिसमें सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी समिधा भारती जी ने अपने प्रवचनो में कहा कि जिझासा मनुष्य के स्वभाव का सहज अंग है। दो- तीन वर्ष का बालक जिसने अभी बोलना शुरू ही किया है,वह अपनी माँ से अनेक प्रशन करता है। जैसे कि माँ इस खाली बाँस में फुँ क मारने से आवाज क्यों आती है। मेरी छोटी सी यह कार स्टार्ट बटन दबाते ही तेजी से क्यों दौड़ पड़ती है। सूरज गोल कयों है,इत्यादि । जैसे -जैसे समय बीतता जा रहा है,इस प्रश्र बैंक में और भी ज्यादा क्यों ,कैसे और क्या जमा होता है। इतिहास साक्षी है कि मनुष्य की जिझासा प्रवृति ने उसे वनस्पति प्राणी जगत व ब्रह्म्माण्ड संबंधित अनेकानेक गुत्थियाँ सुलझाने क ी ओर अग्रसर किया,परन्तु दुभाग्यवश बहुत ही कम ऐसे लोग है। इस सम्बन्ध में किसी ने कहा है कि न्युटन ने पेड की शाखा से गिरते हुए सेब को देखकर कहा कि गुरूत्वकर्षण के नियम की खेज क हालांकि यह खोज विज्ञान और समाज के लिए अत्यंत उपयोगी है।
किन्तु यदि कोई भी उस बल पर विचार करता जिसके द्वारा वह सेब पेड की शाखा से जुडा हुआ था तो हो सकता कि वह जीवन के श्रेष्ठतम नियम (ईवरीय रहस्य ) की खोज कर लेता। अत: सर्वोतम जिझासा है स्वयं को जानना । जीवन के वास्तविक अर्थ और लक्ष्य को जानने की , जब मनुष्य स्वयं क ो जानने के लिए आगे बढता है । तो उसके सामने अनेक पहेलियाँ खडी हो जाती है। इन पहेलियो को सुलझाने का सबसे सरल माध्यम है-हमारे शास्त्र ग्रंथ। इन शास्त्र ग्रंथों में ब्रह्मज्ञानी महापुरूषों और जिझासुओं के बीच हुए संवाद निहित है। जिज्ञासु अध्यात्म विषयक प्रश्र पूछता है। और उन प्रशनो का समाधान देते है। यक्ष और युधिष्ठर के बीच हुई संवाद मानव जीवन संबंधी महत्वपूर्ण पक्षों को उजागर करती है। उस परम सत्ता ईश्वर का ज्ञान ही राजविद्या ब्रह्मज्ञान के मेद्य बरसाने हेतु धरती पर अवतरित होते है। इस विद्या से हम मानव शरीर में ही ईश्वर का दशर््न कर सकते है। इस अवसर पर साधवी त्रिनैना भारती जी ने मधुर भजनो का गायन भी किया।

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