पांच साल के प्राचार्य

कालेज प्राचार्यों की जिस नस्ल का नाम शिक्षा की बेहतरी से जुड़ता है, उसकी तलाश अब नए सिरे से शुरू होगी। हिमाचल प्रदेश ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की इस शर्त को अमलीजामा पहनाने का नीतिगत फैसला लेते हुए समस्त कालेजों में मुखिया की नई खोज का अवसर दिया है। अब क्योंकि प्रिंसीपल का ओहदा पांच साल की सीमित अवधि में शिक्षा का नेतृत्व करेगा, इसलिए प्रदर्शन की नीयत में सुधार आ सकता है। हालांकि शिक्षा में हर सुधार के साथ सुराख भी पैदा होते रहे हैं, इसलिए इसे भी एक प्रयोग के रूप में देखा जाएगा। प्राचार्यों की खेप में अचानक एक बाढ़ आई है और इसकी वजह आवश्यकता से कहीं अधिक नए कालेजों का खुलना माना जा सकता है। हिमाचल में अचानक नए कालेजों का विस्तार शिक्षा के स्तर को जिस आधार पर ले आया है, वहां प्रिंसीपल नामक शख्स भी एक समझौते का निरूपण ही है। यह इसलिए भी क्योंकि कालेज के जरिए सियासत जो जीतना चाहती है, उन मानदंडों के कारण शिक्षा व शिक्षक के आचरण में निरंतर गिरावट आ रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने तो पहले भी प्राचार्य की भूमिका में, एक शिक्षाविद और आदर्श पुरुष के चयन का रास्ता बनाया था, लेकिन यह पद्धति अपनी पूर्ण सफलता प्रदर्शित नहीं कर पाई। दरअसल उच्च शिक्षा का निरूपण अब सियासी तीमारदारी बन गया है, अत: यह तय करना मुश्किल है कि बड़ी बीमारी है कहां। बार-बार परिवर्तन की खोजबीन में उपायों का शृंगार होता है, मगर उद्देश्यों का वृतांत नहीं बदलता। ऐसे में प्रिंसीपल होने का पांच साला सफर यूं तो कड़े इम्तिहान की ओर इशारा कर रहा है, लेकिन चयन में दर्ज पसंद का अपना निर्धारित रुतबा व कोटा है। विडंबना भी यही है कि हम अच्छे व सफल प्राचार्य को किसी कम छात्र संख्या के कालेज में छोड़ देते हैं, ताकि उसकी विशिष्टता व अनुभव एक टूटी हुई बैसाखी की तरह किसी कोने में दब कर रह जाए। बेशक हिमाचल ने दिलेरी दिखाते हुए प्रिंसीपल पद की समयावधि तय कर दी, लेकिन स्थानांतरण के मायने नहीं बदलेंगे तो इस कोशिश का तराजू भी टूट जाएगा। मोटे तौर पर प्रदेश में दो तरह के कालेज देखे जा सकते हैं। एक पुराने तथा छात्र शुमारी में अव्वल रहे कालेज तथा दूसरे घोषणाओं के सरकारी सबूत। जाहिर है दोनों के औचित्य, परिदृश्य और परिवेश में अंतर होगा, लेकिन एक समानता प्रिंसीपल की नियुक्ति को लेकर अवश्य है। छात्र संख्या सौ हो या पांच हजार, प्रिंसीपल बनने की शर्तें या स्थानांतरण की चि_ी दो तरह के कालेजों में एक समान रहेगी।
यानी कि एक बड़े और महत्त्वपूर्ण कालेज में अव्वल प्राचार्य की देखरेख को छीनकर वहां किसी पदोन्नति की तरफदारी में परिसर सौंपा जा सकता है। विडंबना यह भी कि हिमाचल में सभी कालेजों का प्रारूप एक जैसा है, भले ही इक्के-दुक्के को एक्सीलैंस का तमगा पहना दिया गया हो। ऐसे में ऐतिहासिक कालेजों का संरक्षण अपरिहार्य है और यह भी कि नए कालेजों के औचित्य को सियासत से ऊपर उठने का मौका दिया जाए। पांच साल तक की नियुक्ति को बेहतर बनाने के लिए तमाम प्राचार्यों को उनकी पसंद के कालेजों में से किसी एक विकल्प पर पूरी अवधि तक खुद को साबित करने का मौका मिले, तो अगले चरण की कोशिश का इतिहास बनेगा। वरना पांच साल में उच्च शिक्षा की एक पीढ़ी के गुम होने का खतरा भी तो रहेगा। हिमाचल की उच्च शिक्षा में इसी तरह अन्य बदलाव भी करने होंगे, ताकि गुणवत्ता का आधार भवनों से कहीं अधिक उच्च स्तर की फैकल्टी के जरिए साबित किया जा सके।

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *