सूक्ष्म हिंसा स्थूल हिंसा से कुछ कम घातक नहीं : साध्वी आभा

जालन्धर, (मैट्रो नेटवर्क)। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से अर्बंन एस्टेट फे ज़-1 में महावीर जयंती पर सत्संग कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए साध्वी आभा भारती जी ने अपने प्रवचनों में सूक्ष्म हिंसा स्थूल हिंसा से कुछ कम घातक नही । बल्कि कायिक हिंसा यदि शाख, पत्ते, फूल फूल है,मानसिक हिंसा ही उसकी मूल जड है। मानसिक हिंसा से ही बाहरी हिंसा फलती फ ुलती है। जो मन से हिंसक है वे पहले भीतर फि र बाहर से किसी का भी हनन करता है-ये प्रवचन भगवान महावीर जी के थे , और मानवता को एक उदघोष ‘अहिंसा परमो धर्म: साध्वी जी ने कहा कि महावीर जी अहिंसा के प्रवर्तक थे। स्वयं भगवान महावीर का चरित्र स्वयं इस सम्सया का हल थे और अहिहंसा की प्रति मुर्ति थे उन्होंने कहा था कि हमें अपने भीतरी वैरियों पर विजय पाने हेतु अंतर्मुखी होना होगा तभी हम आन्तरिक शत्रुओं का हनन कर पाएँगें। भगवान महावीर ने आत्मस्थित होने के लिए त्रिपदी सूत्र दिया था। यह त्रिपदी है सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र। आत्मा का दर्शन करना- सम्यक् दर्शन, आत्मा को जानना – सम्यक् ज्ञान और आत्मा में रमण करना ही सम्यक् चरित्र है। आत्मा को देखे, जाने व अनुभव किए बिना तुम उसमें कैसे स्थित हो सकते हो? इसलिए एक पूर्ण आचार्य का सान्निधय प्राप्त करो। उनकी कृ पा द्वारा ही तुम सम्यक् दर्शन कर पाओगे, दर्शनोपरान्त ही तुम आत्मा को तत्वत: जान पाओगे, जिस के बाद तुम्हारा चरित्र सम्यक् होगा।
तुम आत्मस्थित हो पाओगे तभी आंतरिक शत्रु ध्वस्त होंगें और विजय बिगुल बज सकेगा। स्वामी जी ने कहा कि हम प्रतिवर्ष अरिहंतो, सिद्वों आचार्यों का जन्मदिन मनाते है। परन्तु हममें से कितने लोग है जो इनको जीते है। इनको जीने का अर्थ हैं इनके दर्शन को जीना, इनकी जागरूकता को जीना और इनसे प्राप्त दिशाबोध को जीना। इन महापुरूषों ने सदैव यही राह दिखाई- दूसरों की जय से पहले खुद को जय करें। चौबीसों तीर्थंकरों व सिद्धों ने हमें त्रिपदी द्वारा स्वंय विजयी बनने की प्रेरणा दी और फि र जैन शब्द तो निकला ही जिन् धातु से है जिसका अर्थ होता है- जीतना। पर क्या आज तक हम इस परिभाषा पर खरे उतर पाए? स्वंय को जीत पाए? पूछिए अपने आप से।

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