समस्त मनोरथों को पूर्ण करता है रूद्राभिषेक

अभिषेक का मतलब होता है भगवान की मूर्ति पर मंत्रों के साथ दूध, शहद, घी, जल आदि डालना। ऐसा माना जाता है कि यह भगवान को खुश करने का सबसे अच्छा तरीका है। भगवान शिव को रुद्र भी कहा जाता है और उनका अभिषेक जब विशेष स्त्रोत पाठ के द्वारा किया जाता है, तो उसे रुद्राभिषेक कहते हैं। भगवान शिव महादेव हैं, महाकाल हैं, आशुतोष है, क्षिप्रवरदायी हैं, इसीलिए उन्हें औढरदानी कहा जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने उनकी महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि भाविउ मेटि सकहीं त्रिपुरारी, यानी भगवान शिव भाग्य की दिशा भी बदल सकते हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए सदैव वृहद धार्मिक अनुष्ठानों की आवश्यकता नहीं होती है, वह जलधार और बिल्वपत्र से भी प्रसन्न हो जाते हैं। वह अभिषेकप्रिय हैं, इसलिए भक्त अपने मनोरथों को पूरा करने के लिए विविध पदार्थों से अभिषेक करने का अनुष्ठान करते हैं। अभिषेक भगवान शिव के रुद्र रूप का किया जाता है, इसलिए उनके अभिषेक के अनुष्ठान को रुद्राभिषेक के नाम से जाना जाता है। रुद्राभिषेक में रुद्राष्टाध्यायी का पाठ किया जाता है। रुद्राभिषेक अलग-अलग पवित्र पदार्थों से किया जाता है और पदार्थों के अनुरूप इनका फल भी अलग-अलग बताया गया है। रुद्राभिषेक में प्रयुक्त किए जाने वाले अधिकांश पदार्थ स्वास्थ्य वद्र्धक होते हैं। जैसे कि गाय का दूध, गाय घी और दही, शहद, गन्ने का रस, विभिन्न प्रकार के अनाज, विभिन्न स्रोतों से एकत्रित किए गए तिल, जौ, विभिन्न प्रकार के तेल, बेल पत्र, आक के फूल, धतूरा इत्यादि का प्रयोग इसमें किया जाता है। रुद्राभिषेक भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे अच्छा अनुष्ठान माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इससे सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूरी की जा सकती हैं। मान्यता है कि इस अनुष्ठान से नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षा मिलती है। ये पापों का क्षय करता है। जीवन में शांति और संपन्नता आती है। बीमारियों को दूर करने में सहायता करता है। कुंडली के समस्त दोषों का नाश होता है। इससे वास्तु दोषों का भी नाश होता है। विवाद और कानूनी समस्याओं से मुक्ति मिलती है। अभिषेक का मतलब होता है भगवान की मूर्ति पर मंत्रों के साथ दूध, शहद, घी, जल आदि डालना। ऐसा माना जाता है कि यह भगवान को खुश करने का सबसे अच्छा तरीका है। भगवान शिव को रुद्र भी कहा जाता है और उनका अभिषेक जब विशेष स्त्रोत पाठ के द्वारा किया जाता है, तो उसे रुद्राभिषेक कहते हैं।
रुद्राभिषेक का शुभ मुहूर्त : सावन का महीना भगवान शिव का महीना माना जाता है और सोमवार को भगवान शिव का दिन। इसलिए सावन के सोमवार को रुद्राभिषेक कराना सबसे शुभ और फलदायी माना जाता है। इसके अतिरिक्त महाशिवरात्रि को भी रुद्राभिषेक कराना बहुत फलदायी माना जाता है। रुद्राष्टाध्यायी के अनुसार शिव ही रुद्र हैं और रुद्र ही शिव हैं। वस्तुत: जो दु:ख हम भोगते हैं, उसका कारण हम सब स्वयं ही हैं। हमारे द्वारा जाने-अनजाने में किए गए प्रकृति विरुद्ध आचरण के परिणाम स्वरूप ही हम दु:ख भोगते हैं। रुद्र सभी दु:खों से हमें तार देता है। प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी जब अपने जन्म का कारण जानने के लिए भगवान विष्णु के पास पहुंचे तो उन्होंने ब्रह्मा की उत्पत्ति का रहस्य बताया और यह भी कहा कि मेरे कारण ही आपकी उत्पत्ति हुई है। ब्रह्माजी यह मानने के लिए तैयार नहीं हुए और दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध से नाराज भगवान रुद्र लिंग रूप में प्रकट हुए। इस लिंग का आदि-अंत जब ब्रह्मा और विष्णु को कहीं पता नहीं चला तो उन्हें अपनी तुच्छता का भान हुआ और उन्होंने लिंग का अभिषेक कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। एक कथा में स्वयं भगवान शिव इस अनुष्ठान के महत्त्व का वर्णन करते हैं। कथा के अनुसार शिव सपरिवार वृषभ पर बैठकर विहार कर रहे थे। उसी समय माता पार्वती ने मृत्युलोक में रुद्राभिषेक कर्म में प्रवृत्त लोगों को देखा तो भगवान शिव से जिज्ञासा प्रकट करते हुए कहा कि इस तरह आपकी पूजा क्यों की जाती है? तथा इसका फल क्या है? भगवान शिव ने उनको संबोधित करते हुए कहा कि जो मनुष्य शीघ्र ही अपनी कामना पूर्ण करना चाहता है, वह आशुतोष स्वरूप मेरा विविध द्रव्यों से विविध फल की प्राप्ति हेतु अभिषेक करता है। जो मनुष्य शुक्लयजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी से अभिषेक करता है, उसे मैं प्रसन्न होकर शीघ्र मनोवांछित फल प्रदान करता हूं।
कौन से शिवलिंग पर करें रुद्राभिषेक : अलग-अलग शिवलिंग और स्थानों पर रुद्राभिषेक करने का फल भी अलग होता है। मंदिर के शिवलिंग का रुद्राभिषेक करना बहुत उत्तम होता है। इसके अलावा घर में स्थापित शिवलिंग पर भी अभिषेक कर सकते हैं। रुद्राभिषेक घर से ज्यादा मंदिर में, नदी तट पर और सबसे ज्यादा पर्वतों पर फलदायी होता है।
अलग-अलग वस्तुओं से अभिषेक करने का फल : रुद्राभिषेक में मनोकामना के अनुसार अलग-अलग वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। मान्यता के अनुसार घी की धारा से अभिषेक करने से वंश बढ़ता है। इक्षुरस से अभिषेक करने से दुर्योग नष्ट होते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं। शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने से इनसान विद्वान हो जाता है। शहद से अभिषेक करने से पुरानी बीमारियां नष्ट हो जाती हैं। गाय के दूध से अभिषेक करने से आरोग्य मिलता है। शक्कर मिले जल से अभिषेक करने से संतान प्राप्ति सरल हो जाती है। भस्म से अभिषेक करने से इनसान को मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। कुछ विशेष परिस्थितियों में तेल से भी शिव जी का अभिषेक होता है। श्रावण मास में इस महाफलदायी और पुण्यदायी अनुष्ठान को अवश्य संपादित करना चाहिए। अगर आप कुछ ज्यादा न कर पाएं, तो सावन महीने के हर सोमवार को मंदिर में जाकर शिवलिंग पर दूध का अभिषेक करें। इससे आरोग्य मिलता है। कई लोग सावन के हर सोमवार को व्रत भी करते हैं। व्रत के लिए विशेष विधि-विधान तय किए गए हैं। इन दिनों भी रुद्राभिषेक किया जाता है, जिसके अलग-अलग फल भक्तों को मिलते हैं। शिवजी की एक विशेषता यह है कि ये जल्द प्रसन्न हो जाते हैं। जो लोग एक बार शिवजी की शरण में चले जाते हैं, उन्हें शिवजी निराश नहीं करते हैं। वैसे शिवरात्रि पर किया गया रुद्राभिषेक भी काफी धार्मिक महत्त्व रखता है। इस दिन भी लोग व्रत करते हैं तथा मंदिरों व घरों में शिवजी की विशेष पूजा का आयोजन होता है। जो भक्त जल्द से जल्द फल चाहते हैं, उनके लिए भगवान शिव की उपासना उत्तम है।

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