गुफा से बचाए गए कुछ लडक़े हैं बेहद गरीब, देश की नागरिकता भी नहीं है

बैंकॉक, (मैट्रो नेटवर्क)। 14 साल का एडुल सेम उन 12 खिलाडिय़ों में से एक है जो अपने कोच के साथ 23 जून को उत्तरी थाईलैंड की टैम लूंग गुफा में फंस गया था। गुफा में फंसने के बाद सभी 12 खिलाडिय़ों और उनके कोच की जिंदगी दांव पर लगी थी लेकिन 8 देशों के 90 गोताखोरों के हौसले की बदौलत सबको नया जीवन मिल गया। लेकिन एडुल सेम के लिए जिंदगी का दांव पर लगना नई बात नहीं है। जब एडुल महज 6 साल का था तब उसका परिवार म्यांमार के एक हिंसाग्रस्त क्षेत्र से भागकर थाईलैंड आ गया था। एडुल के माता-पिता चाहते थे कि उनके बेटे को अच्छी शिक्षा मिले और उसका भविष्य उज्ज्वल हो इसलिए बचकर थाईलैंड आ गए। हालांकि एडुल के लिए मंगलवार का दिन जिंदगी की सबसे बड़ी जीत का दिन रहा।
एडुल और उसके साथी 23 जून को गुफा में फंस गए थे। 2 जुलाई को जब ब्रिटिश गोताखोर उन तक पहुंचा तो वही एकमात्र ऐसा खिलाड़ी था जो अंग्रेजी में बात कर सकता था। उसने ही ब्रिटिश गोताखोर से बात की। दिन पूछा, खाने और पानी की जरूरत बताई। यानि टीम के साथ एडुल न होता तो शायद उसे और तकलीफ का सामना करना पड़ता।
एडुल अंग्रेजी के अलावा थाई, बर्मी और चीनी भी बोलता है। वह सात साल की उम्र से ही स्कूल कैम्पस में रहता है। एडुल मे साई नाम के बॉर्डर वाले इलाके में रहता है जिसे थाईलैंड में गर्व से नहीं देखा जाता। यह इलाका थाईलैंड, म्यांमार और लाओस के तिकोने पर स्थिति है इसलिए इसे ग्लोडन ट्राएंगल भी कहा जाता है। ग्लोडन ट्राएंगल में ऐसे लोग बहुतायत में हैं जो म्यांमार में स्वायत्तता के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
कोच इकापोल चांथावोंग के अलावा फुटबॉल टीम के तीन और खिलाड़ी ऐसे हैं जो नागरिकता विहीन अल्पसंख्यक हैं। ये सभी शाम को म्यांमार जाकर सुबह फुटबॉल खेलने थाईलैंड आने के लिए अभ्यस्त हैं।
फिलहाल इन फुटबॉल खिलाडिय़ों ने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी जंग तो जीत ली है लेकिन आगे उन्हें फिर वहीं संघर्ष के साथ जिंदगी जीनी होगी जिनसे वे 23 जून से पहले दो-चार हो रहे थे।

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