सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में किया संशोधन, दहेज उत्पीडऩ की शिकायत मिलते ही होगी आरोपियों की गिरफ्तारी

नई दिल्ली, (मैट्रो नेटवर्क)। दहेज प्रताडऩा के मामलों में पति और उसके परिवार की तुरंत गिरफ्तारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इन मामलों में आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी पर से रोक हटा ली है। अब अगर कोई महिला अपने पति और उसके परिवार के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए के तहत दहेज उत्पीडऩ का मामला दर्ज कराती है तो उनकी तुरंत गिरफ्तारी हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि ऐसे मामलों में शिकायतों के निपटारे के लिए परिवार कल्याण समिति की जरूरत नहीं है। अदालत ने कहा कि कुछ लोगों द्वारा कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है और पीडि़त की सुरक्षा के लिहाज से भी ऐसा करना जरूरी है। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा है कि आरोपियों के लिए अग्रिम जमानत का विकल्प खुला है।
आपको बता दें कि दहेज प्रताडऩा के मामले में सीधी गिरफ्तारी पर रोक के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल अप्रैल महीने को फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने पिछले साल दिए अपने फैसले में कहा था कि दहेज प्रताडऩा के केस में सीधे गिरफ्तारी नहीं होगी लेकिन इस फैसले के बाद चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली तीन जजों की बेंच ने कहा था कि दहेज प्रताडऩा मामले में दिए फैसले में जो सेफगार्ड दिया गया है उससे वह सहमत नहीं हैं। दो जजों की बेंच के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अगुआई वाली तीन जजों की बेंच ने दोबारा विचार करने का फैसला किया था और सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।
पीठ ने कहा था कि 498ए को लेकर आईपीसी में पहले से ही प्रावधान है ऐसे में कोर्ट दिशा निर्देश कैसे बना सकता है? हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि जांच एजेंसी को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते वक्त चौकस रहना चाहिए लेकिन गाइडलाइंस क्यों बनाना चाहिए।
गौरतलब है कि पिछले साल 28 जुलाई को राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश मामले में दो सदस्यीय पीठ ने कई दिशा निर्देश जारी किए थे। इनमें दहेज उत्पीडऩ मामले में बिना जांच-पड़ताल के पति और ससुरालियों की गिरफ्तारी पर रोक की बात कही गई थी। साथ ही पीठ ने हर जिले में कम से एक परिवार कल्याण समिति के गठन का निर्देश दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि 498ए की हर शिकायत को समिति के पास भेजा जाए और समिति की रिपोर्ट आने तक आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। साथ ही इस काम के लिए सिविल सोसायटी को भी शामिल करने का निर्देश दिया गया था।

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