सभी रोगों की जड़ केवल मोह : साध्वी भद्रा

जालन्धर, (मैट्रो सेवा)। ‘सुनहु तात अब मानस रोगा ’ त्रेता युग का यह प्रशन आज के समय के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है । कारण कि आज का मनुष्य तो सबसे अधिक मानसिक रोगो से त्रस्त है। अधिकांश शरीरिक बीमारियों का तो सही समय पर पता लगाकर उन्हे समूल नष्ट किया जा सकता है,परन्तु मन की व्याधियाँ बहुत सूक्ष्म है । अत: इनका पता लगाना और फिर नष्ट करना बड़ा दुष्कर है। ये समझाते हुए सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्य साध्वी भद्रा भारती जी ने अपने प्रवचनों में कहा के मानसिक रोगों से पीडित सामाज को कैसे बचाया जा सकता है,उन्होंने कहा के यह भी सर्वविदित है, कि स्थूल का आधार हमेंशा सूक्ष्म होता है। यदि सूक्ष्माधार स्वस्थ नही है, तो स्थूल भी प्रभावित होता है, जैसे यदि हमारे शरीर के सुक्ष्म लाल व सफेद रक्त कण सही अनुपात में नहीं तो हमारी देह का संचालन भी असत व्यस्त हो जाएगा। और आगे कहते हैं कि सभी रोगों की जड़ मोह है। इसी विषाकत जड़़़ की उत्पति होती है- लोभ ,काम क्रोध जैसे जहरीलो ये फल वात ,कफ और पित के सामान ही कष्टकारी है,और आत्म प्रवेचना ,पाखंड मद जैसे अवगुण त्वचा रोग कोढ ,गठिया आदि के सामान है। संतान ,धन व मान की कामना घोर तिजोरी है। मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर है। शरीरक बीमारी के इलाज के लिए जैसे हम एक चिकित्सक से परामर्शकर यथोचित औषधि का सेवन करते है। उसी प्रकार सूक्ष्म मानस रोगो के निराकरण के लिए भी कारागर सूक्ष्म औषधि अपेक्षित है।
कुरूक्षेत्र की भुमि पर मोह से ग्रसत अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण ने ज्ञान रूपी सूक्ष्म दिव्य औषधि प्रदान की इस औषधि का पान करते ही अर्जुन तत्क्षण मानसिक दौर्बलय को त्याग ,गांडीव धारण कर युद्ध करने को तैयार हो गया ।गुरू ग्रंथ साहिब में इस औषधि को नाम की संज्ञा दी है,-सरब रोग का अउुखुद नाम-अत: यदि हम ऐन्द्रिक सुख भोगों से परहेज करते है । और अपने चित को नाम सुमिरन रूपी औषधि का सेवन कराते हैं। तो निश्चय ही इस संजीवनी से हमारे सभी रोगो का उपचार हो जाता है।

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